love, peace, harmony and humanity
Friday, 12 July 2019
मीर ताहिर अली रिज़वी
मकतब-ए-इश्क़
का
दस्तूर
निराला
देखा
उस
को
छुट्टी
न
मिली
जिस
को
सबक़
याद
हुआ
मीर ताहिर अली रिज़वी
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया निदा फ़ाज़ली
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