Friday, 12 July 2019

मीर ताहिर अली रिज़वी

मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखा
उस को छुट्टी मिली जिस को सबक़ याद हुआ
मीर ताहिर अली रिज़वी

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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़