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Friday, 12 July 2019
उबैदुल्लाह अलीम
अज़ीज़
इतना
ही
रक्खो
कि
जी
सँभल
जाए
अब
इस
क़दर
भी
न
चाहो
कि
दम
निकल
जाए
उबैदुल्लाह अलीम
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया निदा फ़ाज़ली
उबैदुल्लाह अलीम
अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए उबैदुल्लाह अलीम
तलाश
मुझे तलाश थी जिसकी वह मेरे अंदर था मगर मैं ढूंढ रहा था उसे जमाने में (फहीम क़रार)
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