Friday, 12 July 2019

उबैदुल्लाह अलीम

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
अब इस क़दर भी चाहो कि दम निकल जाए

उबैदुल्लाह अलीम

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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़