love, peace, harmony and humanity
Saturday, 11 May 2019
डॉ. कामरान ख़ान 'मुन्तज़िर'
जो मौसम तेरे साथ थे ख़ूबसूरत
वही अब तेरे बिन सताने लगे हैं
तेरी याद की खिल रही टहनियों पर
अभी तक वो लम्हे पुराने लगे हैं
डॉ. कामरान ख़ान 'मुन्तज़िर'
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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